कर्म की कुशलता

स्कूल जाते बच्चे

(एक दिन में एक पत्रिका को पढ़ते हुए एक लघुकथा लिखने के लिए प्रस्ताव पाया जिसका शीर्षक था कर्म की कुशलता पर उसे प्रस्तुत करने की अंतिम तिथि अगले दो दिन में समाप्त होने वाली थी I तुरंत विचार किया और इस लघुकथा को लिख दिया I आइए पढ़ते हैं कर्म की कुशलता …)

एक दिन जब गाँव के कुछ बच्चे विद्यालय जा रहे थे I तभी एक नीली बत्ती वाली गाड़ी उनके सामने से तेज गति से धूल उड़ाते हुए उनके पीछे चली गई I तभी उनमें से एक लड़का धीरज अपने मित्रों से पूछा – “इसमे कौन बैठता है और क्या करता है ? ”उन्ही छात्रों में एक बड़ी कक्षा का छात्र दीपक बोला – “मजिस्ट्रेट I” “ये मजिस्ट्रेट लोग क्या करते हैं ?” धीरज कुछ दूर जाकर पूछा I

दीपक बोला –“यह जिले के सबसे बड़े अधिकारी होते हैं और जिले में नियम और क़ानून की व्यवस्था देखते हैं I” धीरज यह सुनकर चलता गया और स्कूल में घुसने के पहले सबसे बोला “पता नहीं क्यों, ऐसा लगता है कि मैं भी
मजिस्ट्रेट ही बनूँगा I”

धीरज के सभी मित्र हँसते हुए अपनी-अपनी कक्षा में चले गए I धीरज घर जाकर अपनी कॉपी में सबसे पहले पृष्ठ पर ‘मजिस्ट्रेट’ लिख दिया I

धीरज बहुत ही गरीब था I बहुत मुश्किल से उसके पिता ने उसे 12वीं तक ही पढ़ाया I पर, धीरज ने अपना लक्ष्य नहीं छोड़ा और आगे की पढाई के लिए शहर चला गया I विश्वविद्यालय में प्रवेश भी लिया और पढाई के खर्च छोटे-छोटे बच्चों को पढ़ाकर निकालता गया I

एक दिन उसके एक सहपाठी ने कहा कि तुम यहाँ कॉलेज में आकर जब भी देखता हूँ लाइब्रेरी में पढ़ते ही रहते हो I घर पर क्यों नहीं पढ़ते हो ?

मैं इतना इस लिए पढता हूँ कि “अपने आपको ज्ञान से इतना कुशल बना देना चाहता हूँ कि जब कोई परीक्षा दूँ तो कोई प्रश्न का उत्तर लिखना न छूटे और सबसे अलग तरीके से उत्तर लिख सकूँ जिससे मेरे ज्ञान और कर्म की कुशलता दिखाई दे I”

पाँच वर्ष बाद उसने जब किसी नौकरी के लिए परीक्षा देना शुरू किया तो सभी परीक्षाओं में उत्तीर्ण होता ही गया और एक दिन वह भारतीय प्रशासनिक सेवा में नौकरी प्राप्त कर ली I जब वह घर वापस घर आया तो उसकी माँ की खुशी का ठिकाना न रहा I माँ ने बोला “तू तो बहुत बड़ा आदमी बन गया I मैं तो यह कभी सपने में भी नहीं सोची थी I पर, यह
सब तुम्हें प्राप्त करने के लिए हिम्मत कहाँ से आई ?”

धीरज माँ की छाती से लग कर बोला “तू हिम्मत थी और ज्ञान प्राप्त करना मेरे कर्म की कुशलता जिसे मैं प्रतिदिन योग करता गया I“

श्रद्धा से-

अविनाश कुमार राव

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