दृश्य चार
(10 साल बाद, हमारा नेता कैसा हो ? राजीव मदान के जैसा हो I हमारा नेता कैसा हो ? राजीव मदान के जैसा हो, चुनावी प्रचार होता है और चुनाव में जीतकर विधायक बन जाता है, राजीव के सभी परिजन उसे माला पहनाने जाते हैं I)
संवाददाता – (समाचार चैनेल के साक्षात्कार में प्रस्तुत) नमस्कार आपको , बहुत-बहुत बधाई I
राजीव – धन्यवाद !
संवाददाता – सुना है मैंने की पहले आप डॉक्टर बनाना चाहते थे, पर क्या हुआ ?
राजीव – सही सुना है आपने I पर होनी को कौन जानता है ?
संवाददाता – हमने यह भी सुना है कि आप आईपीएस की तैयारी भी कर रहे थे I क्या बाधा उत्पन्न हुई ?
राजीव – हाँ, हमने खूब तैयारी की थी पर चयन नहीं हो पाया I
संवाददाता – आप इस क्षेत्र में आने के लिए आपने कब मन बनाया ?
राजीव – बस यूँ ही दो साल पहले I
सुब्रतराज – (नाश्ता करते हुए अपनी पत्नी से कहते हैं) अपने लाडले साहब को उठाओ नौ बज गए हैं न काम न धाम I
शालिनी – (राजीव के पास जाकर)अभी और कितना सोओगे महाराज ? उठो, तुम्हारे पापा नाराज होकर ड्यूटी चले गए I
राजीव – सुबह-सुबह तुमने दिमाग खराब किया I कितना अच्छा सपना देख रहा था ? नेता बन गया हूँ और टीवी चैनेल वाले इंटरव्यू ले रहे थे I
शालिनी – सब कुछ सपने में ही होता है I हकीकत में कुछ नहीं I हकीकत में तो केवल सोना है और कभी
ये नौकरी और कभी वो नौकरी I तुम्हारे दिमाग में केवल भटकाव है I और कुछ भी नहीं “जिसके
अंदर भटकाव होता है वह बस सपने ही देखता रह जाता है I”
(पर्दा गिर जाता है I)
संदेश:
इस नाटक से हमें यह संसेह्स मिलता है कि हमारे जीवन एक ही लक्ष्य होना चाहिए I लक्ष्य को लेकर किसी प्रकार का ‘भटकाव’ नहीं होना चाहिए I केवल लक्ष्य बाने से भी कुछ नहीं होता उसके लिए ईमानदारी से तैयारी भी होनी चाहिए I
‘श्रद्धा से’-
अविनाश कुमार राव



