परिचय: यह कविता “एक बेर का पेड़” उपेक्षित लेकिन जीवनदायी प्रकृति का मार्मिक चित्रण करती है। इसमें दिखाया गया है कि कैसे एक साधारण-सा पेड़ जिसे लोग तुच्छ समझते हैं वह भी जीवों को आश्रय, छाया और जीवन देता है।
एक बेर का पेड़ कोई नहीं बोता, न लगाता है यह, लोकाचार की बेड़ियाँ बोने नही देतीं, पंछी पंछी के लिए एक दाना गिरा देता है रेगिस्तान की तलहटी हो या ऊसर भूमि और कुदरत की गोद में अंकुरित हो जाता है I पर, सच कहते हैं, जिसका कोई नहीं होता है उसका रब, इसे देखता न कोई न पालता, न पानी देता, पर सोचो, यह क्या नहीं देता छाया , हरियाली और फल ? छातादार छाया और डालियाँ आँगन पंछियों को फुदकने, प्रातः चहचाह के गीत सुनने और ठंडी हवाओं से खेलने के लिए, हर वसंत में फल कर लद जाती हैं लताएँ झुक जाती हैं खिलाने के लिए I बढ़ती बस्तियाँ और सिमटते खेत रेगिस्तान में और बंजर भूमि में अंधाधुंध कट रहे वन गर्मी की तपिश में, मूसलाधार बारिश में हड्डियाँ गलाने वाली ठंड में पंछियों को कौन देता है शरण ? यही बेर का अवमानित पेड़ स्वागत करता है बाहें फैलाकर एकांत एक छोटे से नीड़ के लिए I