प्रतीकात्मक चित्र

मानवता कितनी जकड़ गई

मानवता कितनी जकड़ गईजो दिल्ली इतनी दहक गईशब्द कौन थे वे ?जिसने प्रज्ञा को मूढ़ बना दिया ?आज इंसान इंसानियत कीनीव में चिंगारी लगाए बैठा हैन जाने कौन से स्वार्थ मेंहै झुलस गया,संतुलन, संवेदना खो रहासब चिंतन, सिद्धांतजलाकर भस्म कर दिया |है चेतता जब कोईतेज तूफाँ गुजरता है अपने सिर सेतब चिल्ला-चिल्लाकरआजीवन आमरण अनशन परबैठ …

bhatkaav naatak ke lie drishy

भटकाव

आजकल युवाओं में लक्ष्य के प्रति निश्चितता नहीं दिखाई देती है क्योंकि सोसल मीडिया उन्हें इतने सारे रास्ते दे दिया कि उन्हें समझ नहीं आता कि कौन-सा लक्ष्य उनके लिए सही है I उन्हें भटकने पर मजबूर कर दिया है I ऐसी ही समस्या को लेकर यह नाटक ‘भटकाव’ नाटक देश में फैले भ्रष्टाचार पर …

चुनाव

आओ साथी, कमर बाँध लो हो जाओ तैयार |

फिर खडा चोर हाथ जोड़ तुम्हारे द्वार आओ साथी, कमर बाँध लो हो जाओ तैयार IIजो वर्षों से चूसा तेरा रक्तअब आ गया है वह वक्त,हो जाओ कठोर और सख्तइस बार कर दो पलट तख़्त,न जीतने दो फिर इस बारआओ साथी, कमर बाँध लो हो जाओ तैयार II सालों सैर में किया केवल मद बर्बाद …

VYAAKUL BUDHAAPAA

व्याकुल बुढ़ापा

सब्जियों के संगलकठा या खुरमा लेकर बाजार से आते थे उस मिठाई का जायका सब लेते थे,पोते-पोतियों का दौड़कर आना हँसना, बातें करनाजो बुढ़ापे की राह के साथी थे,अब इम्तिहान आ गया था लाठियों का, बुढ़ापा गिर गया सहसा! एक दिन कूल्हा सरक गया, बोल दी एक बहू ने नहीं खिला पाऊँगी, अब मैं, दूसरी …

shikashak

गुरु रूप ले लेता है शिक्षक |

पैरों में दृढ़ता, इच्छा शक्ति सशक्त, नित नूतन ज्ञान स्रोत परिभाषित है शिक्षक | कभी नारियल फल, ह्रदय सागर सदृश सरसता, उपमा आदर्श चरित्र का बन जाता है शिक्षक | हाथों में ले दुधिया भट्ठी, अक्षर दीप जलाता, कोरे मानस पटल पर अङ्कन करता है शिक्षक | न केवल का पुस्तक, जीवन का पाठ सिखाता, …

रोती होगी माँ धरती, आँचल अपनी फटती देख |

जहाँ एक है सूरज-चाँद का खेलअनोखा अनुपम प्रभा का मेल,हमजोली के आभा का खेललोकालोक दोनों का लक्ष्य एक,पर यहाँ मानव का वैचारिक भेदरोती होगी माँ धरती, आँचल अपनी फटती देख |थे जन्म समय सब में एक रक्त रंगखाया सबने एक ही अन्नएक प्रकृति में पले बढ़े,एक ईश्वर के कर नाम भेद हो धर्म नाम पर बटे …

श्रावणमासः

पूर्वमायाति भाद्राद्यदाषाढस्य परं शुभम्।शिवनामाभिविख्यातं तद्विद्धि श्रावणं श्रुतम्।।1हरितं दिक्षु सर्वत्र गायति नवगीतिकाम्।वर्षन्ति बिंदवो मन्दं श्रावणं नूनमेव च।।2आम्रगन्धो यदा वाति गर्जन्ति कृष्णवारिदा:।केकिनो वीक्ष्य नृत्यन्ति श्रावणं नूनमेव तद्।।3दोलास्तरुषु सर्वत्र वायौ प्लवन्ति वेगत:।     युवत्यो गानलग्नाश्च श्रावणं नूनमेव तद्।।4तडागा जलपूर्णाश्च नद्यो वहन्ति यत्र च।तरन्ति सर्वत्र नौका: श्रावणं नूनमेव च।।5पर्व प्रतीक्षते प्रेम्णा भगिनी स्वगृहेनिशम्।रक्षासूत्रविबन्धाय श्रावणं नूनमेव तद् ।।6देशभक्तान् च संस्तौति यशो गायन्ति …

जूते – एक अनुभव की कविता

पहने जाते हैं बड़े उत्साह से नये जूते,किसी के लिए निचले स्तर की रौंदने की चीज हैं जूते, हमारे पैरों को बचाते हैंकील, कीट, कीड़े, कीचड़ से फिर भी तुच्छ समझे जाते हैं जूते,हिमालय पर चढ़ने वालों से पूछिए कितने गम दबाए हैं जूते, हर पग पथ पर, साक्षी अनुभवों का ठोकरें खाकर आगे बढ़ने …

मीत हो, मीत हो

बादल घनेरे शीतल फुहारेंझमाझम बारिशों की बूँदेंमेरे दिल पर गीत लिख रहे कि एक तुम ही मेरे जीवन की मीत हो मीत हो, मीत हो ||नभ के तारे टिमटिमा रहे यह शाम कितनी है जवां फिजा इतनी है खुशनुमांओ चाँदनी तुम ही मेरे जीवन की प्रीत होमीत हो, मीत हो || बैठो सामने कह दो …