“सूर्य सम्पूर्ण सृष्टि का आधार है। प्रस्तुत कविता में सूर्य के उदय, उसकी ऊर्जा, प्रकाश और जीवनदायी सभी स्वरूप का सुंदर वर्णन किया गया है। यह कविता विद्यार्थियों एवं साहित्य प्रेमियों के लिए सरस बनाने का प्रयास किया गया है I”
मनोरम होता है कितना
प्रातः पूर्व अरुणिमा में उगना,
जग जगाते हुए उदय होना
सूर्य से आलोकित कोना-कोना |
सविता, सूर्य, आदित्य, पूषन्
रवि, भास्कर, सहस्र तेरे हैं नाम,
चीर कर तिमिर आधि-व्याधि का नाश
अखिल विश्व को आलोक देना है काम |
नित नये आयाम, पैगाम लिये होता है
अजस्र स्रोत ऊर्जा शक्ति लिये होता है,
कितना अधिक है तेरा तेज़
ओजोन भी देते हो भेद |
चह-चाह चिड़ियाँ बांग मुर्गे
करते गायन, स्वागत, आह्वान,
मानव करते है तेरा वंदन
होता है तेरा अभिनंदन |
फसलें हँसने लगतीं हैं
तेरे प्रभा में नहाकर,
पञ्चाङ्ग कालक्रम निर्माण
तुझे अवलोकित कर |
ग्रहों के आधार हो तुम
सब जीवों के प्राण हो तुम,
अखिल विश्व में व्याप्त हो तुम
सृष्टि के रचना कर्त्ता हो तुम ||
श्रद्धा से- अविनाश कुमार राव


